गुरु बिन मोक्ष क्यों नहीं?
नमस्कार दोस्तों आज प्रत्येक मनुष्य अनेकों धर्म में अनेकों प्रकार के भगवानों, देवताओं की साधना करते हैं आखिर वो यह साधना क्यों करते हैं। इसकी क्या वजह है कि वह तरह-तरह के मार्ग अपनाते हैं अनेकों प्रकार की पूजा विधि करते हैं। तो आप बता दें यह सब क्रियाएं केवल और केवल सुख शांति व मोक्ष प्राप्त करने के लिए की जाती है।
मनुष्य जीवन का परम उद्देश्य केवल और केवल मोक्ष प्राप्त करना है क्योंकि परमात्मा ने मनुष्य को अपने स्वरूप का बनाया है। और मनुष्य स्वरूप में ही जीव आत्मा मोक्ष प्राप्त कर सकती है। यहां तक कि देवता गण भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सकते।
मनुष्य जीवन का परम उद्देश्य:-
सभी लोग जानते हैं कि मनुष्य जीवन का परम उद्देश्य भगवान की प्राप्ति करना तथा जन्म मरण के चक्र से मुक्त होना है। आपको यह बात भी पता है कि भगवान की सत्य भक्ति के बिना मनुष्य कभी भी सुख से नहीं रह सकता तथा मोक्ष भी नही पा सकता। मोक्ष प्राप्ति के लिए अनेकों धर्म के लोग अनेकों प्रकार की क्रियाकलाप करते हैं जबकि यह सभी करना व्यर्थ है क्योंकि वह केवल और केवल सतगुरु द्वारा बताई गई सत भक्ति से ही प्राप्त हो सकता है।
क्योंकि सतगुरु के अलावा बताई गई सभी प्रकार की भक्ति विधि मन माना आचरण है और गीता जी में मन माना आचरण करने के लिए मना किया है:-
गीता जी अध्याय 16 श्लोक 23 व 24 देखे:-
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
अर्थ:- जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही॥23॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
अर्थ:- इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है॥24॥
क्योंकि जिन भी महापुरुषों को मोक्ष प्राप्त हुआ है वह केवल और केवल सतगुरु द्वारा बताई गई सत भक्ति से ही संभव है। इसकी गवाही पवित्र कुरान पवित्र वेद पवित्र बाइबल तथा पवित्र गीता जी एवं गुरु ग्रंथ साहिब भी देता है।
परमात्मा कबीर साहिब जी ने भी अपनी वाणियों में प्रमाणित किया है कि पूर्ण मोक्ष केवल और केवल सत्भक्ति द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है उस सतभक्ति को करने के लिए सतगुरु की आवश्यकता होती है सतगुरु पृथ्वी पर एक समय में केवल में कोई एक ही होता है।
पूर्ण परमात्मा कबीर साहिब ने अपनी वाणी में सतगुरु की महिमा का वर्णन किया है:-
कबीर गुरु बड़े गोविंद से मन में देख विचार।
हरि सुमरे सो वार है गुरु सुमरे होए पार।।
हरि सुमरे सो वार है गुरु सुमरे होए पार।।
कबीर गुरु गोविंद दोनों खड़े किसके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए।।
बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए।।
कबीर कर्ता करे न कर सके गुरु करे सो होय।
सात दीप नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय।।
सात दीप नौ खंड में गुरु से बड़ा न कोय।।
ऊपर दी गई वाणियों से प्रमाणित होता है कि संसार में मनुष्य के लिए गुरु भगवान से भी बड़ा है यदि वह सतगुरु है तो सतगुरु द्वारा बताई गई सत भक्ति से ही मोक्ष संभव है ऐसी अनेकों गाड़ियों में पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब तथा अन्य संतों ने प्रमाण दिया है कि गुरुद्वारा ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
कौन है सच्चा सतगुरु:-
पवित्र गीता जी में तत्वदर्शी संत अर्थात सतगुरु की शरण मे जाने को कहा है:-
गीता जी अध्याय 4 के श्लोक 34 जिसमें कहा है:-
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया |
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।
तत् – विभिन्न यज्ञों के उस ज्ञान को; विद्धि – जानने का प्रयास करो; प्रणिपातेन – गुरु के पास जाकर के; परिप्रश्नेन – विनीत जिज्ञासा से; सेवया – सेवा के द्वारा; उपदेक्ष्यन्ति – दीक्षित करेंगे; ते – तुमको; ज्ञानम् – ज्ञान में; ज्ञानिनः – स्वरुपसिद्ध; तत्त्व – तत्त्व के; दर्शिनः – दर्शी ।
अर्थ:- तुम गुरु के पास जाकर सत्य को जानने का प्रयास करो। उनसे विनीत होकर जिज्ञासा करो और उनकी सेवा करो। स्वरुपसिद्ध व्यक्ति तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने सत्य का दर्शन किया है।
पवित्र गीता जी में सतगुरु की पहचान:-
ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
ऊर्ध्वभूलम् = आदिपुरुष परमेश्वररूप भूलवाले (और ) ;अश्र्वत्थम् = संसाररूप पीपल के वृक्ष को ; अव्ययम् = अविनाशी ; प्राहु: = कहते है (तथा) ; यस्य = जिसके ; छन्दांसि = वेद ; पर्णानि = पत्ते (कहे गये हैं) ; अध:शाखम् = ब्रह्मारूप मुख्य शाखावाले (जिस); तम् = उस संसाररूप वृक्ष को ; य: = जो पुरुष (मूलसहित) ; वेद = तत्त्व से जानता है ; स: = वह ; वेदवित् = वेद के तात्पर्य को जानने वाला है।
सबसे पहले हम पवित्र गीता जी से प्रमाण देखते हैं। गीता अध्याय 15 श्लोक 1 में गीता ज्ञान दाता ने तत्वदर्शी संत (सच्चा सतगुरु) की पहचान बताते हुए कहा है कि वह संत संसार रूपी वृक्ष के प्रत्येक भाग अर्थात जड़ से लेकर पत्ती तक का विस्तारपूर्वक ज्ञान कराएगा। जो ऊपर से जड़ वाला है तथा नीचे की ओर जिसकी शाखाएं हैं। जिसकी प्रत्येक भाग को जो गुरु वेदविद जानता है वही सच्चा गुरु है।
इसे प्रमाणित होता है कि मुफ्त प्राप्त करने के लिए सतगुरु की आवश्यकता होती है और सतगुरु वही है जो संसार रूपी लटके हुए उल्टे वृक्ष को भलीभांति समझा सके।
पवित्र कबीर वाणी में सतगुरु की पहचान:-
जो मम संत सत उपदेश दृढ़ावै वाके संग सभि राड़ बढ़ावै।
या सब संत महंतन की करणी, धर्मदास मै तो से वर्णी।।
या सब संत महंतन की करणी, धर्मदास मै तो से वर्णी।।
कबीर साहिब जी ने अपनी वाणी में कहा है कि जो सच्चा गुरु सत भक्ति बताएगा उसके साथ सभी लोग ईर्ष्या द्वेष भाव रखेंगे तथा उसको अपमानित किया जाएगा नकली गुरु उसके साथ झगड़ा करेंगे लेकिन वह अपने कार्य को निरंतर जारी रखेगा वह सभी प्रकार की बाधाओं को दूर करते हुए सत भक्ति का प्रचार करेगा।
गरीबदास जी की वाणी में सतगुरु की पहचान:-
सतगुरु के लक्षण कहूं, मधुरे बैन विनोद।
चार वेद षट् शास्त्र, कहै आठरा बोध।
चार वेद षट् शास्त्र, कहै आठरा बोध।
संत गरीबदास जी ने अपने बारे में बताया कि सतगुरु वह है जो चारों वेद तथा छह शास्त्र 18 बोध (जिसमे परमात्मा का वर्णन है) का ज्ञाता होगा।
पवित्र वेदों में सतगुरु की पहचान:-
यजुर्वेद अध्याय 19 मन्त्र 30:-
व्रतेन दीक्षाम् आप् नोति दीक्षया आप् नोति दक्षिणाम् ।
दक्षिणा श्रध्दाम् आप् नोति श्रध्दया सत्यम् आप्यते।।
दक्षिणा श्रध्दाम् आप् नोति श्रध्दया सत्यम् आप्यते।।
भावार्थ:- इस वेद मंत्र में सच्चे गुरु की पहचान बताते हुए कहा गया है की सच्चा सतगुरु उसी व्यक्ति को शिष्य बनाता है जो सदाचारी रहे। अभक्ष्य पदार्थों का सेवन व नशीली वस्तुओं का सेवन न करने का आश्वासन देता है।
| Satguru |
वर्तमान समय में सतगुरु केवल संत रामपाल जी महाराज हैं उन्हीं के पास सभी शास्त्रों का यथार्थ अनुवाद तथा प्रमाणित ज्ञान है उनके द्वारा बताई गई सत्यवती से आज आने को प्रकार के सुख मनुष्य को प्राप्त हो रहे हैं। तथा ऊपर बताए गए सतगुरु की सभी लक्षण है सन्त रामपाल जी महाराज में है।
अतः आप सभी से निवेदन है कि संत रामपाल जी महाराज द्वारा बताए जा रहे सत भक्ति ज्ञान को समझे एवं सत भक्ति करें। क्योंकि सत भक्ति के बिना मनुष्य जीवन का उद्धार नहीं हो सकता। मोक्ष प्राप्त करने के लिए सत भक्ति बहुत ही आवश्यक है। जो व्यक्ति सत भक्ति ना करके मोक्ष प्राप्त नहीं करता है वह 8400000 योनियों के जन्म मरण के चक्र में बंधा रहता है वह अनेक प्रकार के कष्ट उठाता है।
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| Satguru Rampal Ji Maharaj |
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