Jagannath Temple History
भारत में लाखों मंदिर हैं जिनमें प्रमुख हैं भारत के चार धाम बद्रीनाथ, रामेश्वरम, द्वारकापुरी व जगन्नाथपुरी। यह चारों धाम अपने आप में अपना अपना विशेष महत्व रखते हैं आज हम बात करेंगे जगन्नाथ पुरी की जो कि उड़ीसा में स्थित है। जो अपने इतिहास और स्थापना को लेकर कई रहस्य छुपाए हुए हैं आज हम आपको जगन्नाथ पुरी मंदिर व उसके रहस्यों से अवगत कराएंगे।
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| Jagannath Temple Orissa |
जगन्नाथ मंदिर का निर्माण कैसे हुआ व किसने करवाया:-
उड़ीसा के जगन्नाथ पुरी मंदिर का निर्माण राजा इंद्रदमन ने करवाया था। बात उस समय की है जब कृष्ण जी अपनी मरण सैया पर थे तो उन्होंने पांडवों से कहा था कि आप मेरी अस्थियों को एक संदूक में भर के समुद्र में प्रवाह देना। पांडवों ने ऐसा ही किया कृष्ण जी की अस्थियां कुछ समय बाद ओडिशा के तट पर आ गई तथा भगवान कृष्ण ने उड़ीसा के राजा इंद्रदमन को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा हे राजन आपको समुद्र के किनारे एक संदूक में मेरी अस्थियां मिलेंगी जहां पर वह अस्थियां मिले वहां पर आप मेरा मंदिर बना देना और उसमें एक ऐसे संत को रखना जो गीता जी का यथार्थ ज्ञान बताएं।
राजा इंद्रदमन ने यह बात सुबह अपनी पत्नी को बताई तथा दोनों ने विचार-विमर्श कर यह निर्णय लिया कि अब हम कृष्ण जी के आदेश अनुसार वहां पर मंदिर बनाएंगे वह स्थान को देखकर आए तथा मंदिर का निर्माण प्रारंभ किया मंदिर जैसे ही बनने लगा समुद्र आकर उसको तोड़ देता है थस नहस कर देता। राजा ने चार पांच वार प्रयास किए लेकिन मंदिर नहीं बन पाया राजा बहुत ही दुखी हुआ उस समय राजा के दरबार में एक परम शक्तिशाली संत आए जिनका नाम था कबीर आपको बता दें कि कबीर साहेब पूर्ण परमात्मा हैं।
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| Jagnnath Temple |
कबीर साहेब ने राजा से प्रार्थना की कि हे राजन आप मंदिर का पुनः निर्माण करवाएं मैं समुद्र को अपनी भक्ति की शक्ति से रोक दूंगा। राजा ने कहा कि जब श्री कृष्ण जैसे भगवान ही कुछ नहीं कर पाए तो यह संत क्या कर सकेंगे तब जाकर श्री कृष्ण जी ने राजा को पुनः स्वप्न में दर्शन दिए और कहा हे राजन् यह जो संत आपको मिले हैं यह परम शक्तिशाली संत हैं आप इनकी बात मानो आप उन संत की शरण में जाओ और उनसे अनुनय विनय करो वही इस मंदिर के निर्माण कराने में आपकी सहायता कर सकते हैं।
परमात्मा कबीर साहेब ने मंदिर को समुद्र द्वारा नष्ट होने से बचाया:-
अगले दिन राजा अपने कुछ सैनिकों के साथ संत की शरण में गए तथा उनसे अनुनय विनय किया तब कबीर जी ने कहा कि हे राजन आप समुद्र के किनारे मेरा एक चबूतरा बनवा दो मैं उस पर बैठकर स्मरण करुगा और समुद्र देव को रुकूंगा। जगन्नाथ पुरी के मंदिर के पास वह चबूतरा आज भी मौजूद है उसको कबीर मठ के नाम से जाना जाता है। राजा इंद्र दमन ने ऐसा ही किया मंदिर का निर्माण प्रारंभ हुआ समुद्र अपने उफान पर आने लगा और बहुत ही तेज गति से मंदिर की ओर बढ़ने लगा तब परमात्मा कबीर साहिब ने अपने आशीर्वाद वाले हाथ से समुद्र को रोक दिया रुका हुआ समुद्र ऐसे लग रहा था जैसे कोई 60-70 फीट का पहाड़ खड़ा हो।
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| Fact of Jagannath Temple |
तब समुद्र देव एक विप्र के रुप में आए तथा कबीर साहेब से प्रार्थना की है कबीर साहेब आप मेरा मार्ग छोड़ दीजिए आप मुझे बंधी ना बनाइए मैं इस मंदिर को तोड़ने जा रहा हूं तब कबीर साहिब ने कहा यह समुद्र आप यह मंदिर क्यों तोड़ना चाह रहे हो। समुद्र ने कहा हे परम शक्ति संत भगवान विष्णु ने त्रेता युग में मेरे ऊपर बाण उठाकर तथा मुझे भला-बुरा कह कर बहुत अपमानित किया मैं उसी का प्रतिशोध लेने के लिए यह मंदिर नहीं बनने दे रहा हूं।
तब परमात्मा कबीर साहेब ने कहा कि आप प्रतिशोध में द्वारका नगरी को डूबा चुके हो तो समुद्र ने कहा द्वारका नगरी मैंने पूरी नहीं डुबाई है। तब परमात्मा ने कहा कि आप उस द्वारका नगरी को पूरी को डूबा दो लेकिन वह स्थान छोड़ देना जहां पर श्री कृष्ण की समाधि बनी हुई है ताकि लोगों को पता चल सके कि कृष्ण जी की भी मृत्यु हुई थी समुद्र देव ने परमात्मा कबीर साहेब की आज्ञा को मानकर ऐसा ही किया परमात्मा कबीर साहिब ने समुद्र को आदेश दिया कि आप अब यहां से 1 मील दूर चले जाना आपको बता दें कि समुद्र और मंदिर के बीच की दूरी लगभग 1.5 किलोमीटर है जो कि 1 मील कही जाती है। तथा कुछ समय में वह मंदिर भी बनकर तैयार हो गया।
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| Jagannath Temple History |
जगन्नाथ मंदिर में मूर्ति स्थापना:-
कुछ दिनों में मंदिर बन गया तब वहां पर नाथ परंपरा के एक ऋषि आए उन्होंने राजा इंद्र दमन से कहा कि मंदिर तो बहुत ही भव्य और आलीशान बना है यदि आप इसमें मूर्ति स्थापित कर दो तो यह और भी अच्छा लगेगा। राजा ने कहा कि श्री कृष्ण जी ने मुझे मूर्ति लगाने के लिए मना किया है लेकिन उस ऋषि ने कहा कि यदि आप मंदिर में मूर्ति नहीं लगाओगे तो अच्छा नहीं होगा राजा ने ऋषि के डर से मंदिर में मूर्ति स्थापना करने का निर्णय लिया। उसने मूर्ति कारों को काम पर लगाया लेकिन जैसे ही मूर्ति बनती वह टूट जाती कोई भी कारीगर मूर्ति बनाने में सफल नहीं हो पाया। राजा को चिंता सताने लगी कि कहीं ऋषिवर श्राप देकर मेरे राज्य को नष्ट ना कर दें।
तब परमात्मा कबीर जी ने एक 80 वर्ष के मिस्त्री का रूप बनाया व राजा के दरबार में गए तथा राजा से कहा हे राजन् मैं आप की मूर्तियां बना सकता हूं। लेकिन मेरी एक शर्त है मैं जब तक मूर्ति बनाऊं तब तक एकांत में किसी कमरे में रहूंगा आपको मूर्ति बनाने का सभी सामान उस कमरे में रखवा देना है जब तक मूर्ति नहीं बनेगी कोई भी मेरी आज्ञा बिना उस कमरे में नहीं आएगा। राजा ने ऐसा ही किया कुछ समय पश्चात नाथ जी राजा के पास आए तथा उनसे कहा कि राजा अभी तक मूर्ति स्थापित नहीं हुई इसका क्या कारण है राजा ने कहा हे नाथ जी मूर्तियों का कार्य चल रहा है एक मिस्त्री मूर्तियां बना रहे हैं मूर्तियां बनते ही मंदिर में स्थापित कर दी जाएगी।
नाथ ने कहा कि बताओ कहां पर मूर्तियां बनाई जा रही है। राजा उन ऋषि को लेकर अमुक स्थान पर गए तथा देखा कि उस कमरे से कोई भी आवाज नहीं आ रही है तब नाथ जी ने कहा कि आपने जो मिस्त्री मूर्ति बनाने के काम के लिए रखा है वह महीने भर से भूखा प्यासा था शायद वह मर गया होगा। आप दरवाजा खुलवाइए राजा ने सोचा शायद कहीं ऐसा तो नहीं कि वह कारीगर मर गया तब उन्होंने अपने सिपाहियों को आदेश देकर मूर्ति का कमरा खुलवा दिया परमात्मा उसी समय वहां से अंतर्ध्यान हो गए । तथा मूर्ति के हाथ और पैरों के पंजे नहीं बन पाए मूर्ति आधी अधूरी रह गई नाथ जी ने कहा शायद श्री कृष्ण जी की यही इच्छा हो इसलिए आप इन मूर्तियों को बिना पंजे के ही स्थापित कर दो।
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| Jagannath Murti Sthapana |
तब परमात्मा कबीर जी ने एक 80 वर्ष के मिस्त्री का रूप बनाया व राजा के दरबार में गए तथा राजा से कहा हे राजन् मैं आप की मूर्तियां बना सकता हूं। लेकिन मेरी एक शर्त है मैं जब तक मूर्ति बनाऊं तब तक एकांत में किसी कमरे में रहूंगा आपको मूर्ति बनाने का सभी सामान उस कमरे में रखवा देना है जब तक मूर्ति नहीं बनेगी कोई भी मेरी आज्ञा बिना उस कमरे में नहीं आएगा। राजा ने ऐसा ही किया कुछ समय पश्चात नाथ जी राजा के पास आए तथा उनसे कहा कि राजा अभी तक मूर्ति स्थापित नहीं हुई इसका क्या कारण है राजा ने कहा हे नाथ जी मूर्तियों का कार्य चल रहा है एक मिस्त्री मूर्तियां बना रहे हैं मूर्तियां बनते ही मंदिर में स्थापित कर दी जाएगी।
नाथ ने कहा कि बताओ कहां पर मूर्तियां बनाई जा रही है। राजा उन ऋषि को लेकर अमुक स्थान पर गए तथा देखा कि उस कमरे से कोई भी आवाज नहीं आ रही है तब नाथ जी ने कहा कि आपने जो मिस्त्री मूर्ति बनाने के काम के लिए रखा है वह महीने भर से भूखा प्यासा था शायद वह मर गया होगा। आप दरवाजा खुलवाइए राजा ने सोचा शायद कहीं ऐसा तो नहीं कि वह कारीगर मर गया तब उन्होंने अपने सिपाहियों को आदेश देकर मूर्ति का कमरा खुलवा दिया परमात्मा उसी समय वहां से अंतर्ध्यान हो गए । तथा मूर्ति के हाथ और पैरों के पंजे नहीं बन पाए मूर्ति आधी अधूरी रह गई नाथ जी ने कहा शायद श्री कृष्ण जी की यही इच्छा हो इसलिए आप इन मूर्तियों को बिना पंजे के ही स्थापित कर दो।
जगन्नाथ मंदिर में से छुआछूत कैसे समाप्त हुई:-
मूर्तियां स्थापित हो जाने के कुछ समय बाद नगर के मुख्य पण्डे सहित राजा और उनके सिपाही मूर्ति में प्राण स्थापित करने के लिए मंदिर में गए। वहां पर पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी एक शूद्र का रूप बनाकर आए तथा मंदिर के सामने खड़े हो गए। तब नगर के मुख्य पण्डे ने उन को धक्का देकर वहां से दूर कर दिया जब नगर के पंडे मूर्ति में प्राण स्थापित करने लगे तो उन्हें उन तीनों मूर्तियों में शूद्र का चेहरा दिखाई दिया लेकिन पंडो ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया।
कुछ समय बाद मंदिर के मुख्य पंडा जिसने परमात्मा को धक्का मारा था। उसके कोढ़ का रोग हो गया और उसने अपना इलाज बहुत जगह कराया बहुत से वेदों को दिखाया लेकिन उसके कोई भी फायदा नहीं पड़ा। तब श्री कृष्ण जी ने उसको स्वप्न में आकर दर्शन दिए और कहा कि आपने जिस शुद्र को धक्का मारा था वह परम शक्ति है वह पूर्ण परमात्मा है आप उनसे जाकर क्षमा याचना कीजिए वही आपके कोढ़ के रोग को दूर कर सकते हैं।
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| Jagannath Temple Facts |
अगली सुबह पंडा जागकर उन परम शक्ति संत के पास में गए जो कि शुद्र के रूप में रहते थे। परमात्मा ने पण्डे को अपनी तरफ आता देख चार कदम पीछे हो गए तथा कहा कि आप मेरे पास मत आइए नहीं तो आप भी शूद्र हो जाओगे। तब पण्डे ने परमात्मा को दंडवत प्रणाम किया और कहा हे परम शक्ति आप ही मेरे रोग को ठीक कर सकते हो मुझे क्षमा कीजिए तथा मेरी गलती को माफ करो मुझे अपनी शरण में ले लो और मेरे कोड के रोग को ठीक करो। पण्डे ने उस शूद्र परमात्मा के पैरों को धोया तथा उनके चरणामृत को पिया तब परमात्मा ने कहा कि आप जी 40 दिन तक मेरे चरणामृत को पीना आपका कोढ़ का रोग दूर हो जाएगा। उसी समय से जगन्नाथ पुरी मंदिर के अंदर छुआछूत खत्म हो गई आज भी जगन्नाथ मंदिर में किसी भी प्रकार की छुआछूत नहीं है वहां पर शूद्र और पंडे एक ही थाली में बैठकर भोजन करते हैं। जगन्नाथ पुरी मंदिर भारत का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां पर मंदिर के निर्माण से लेकर अब तक किसी भी प्रकार की छुआछूत नहीं है।
विचार करे:-
श्री कृष्ण भगवान को तीन लोक का स्वामी कहा जाता है तथा उनकी भी मृत्यु हुई तो सोचने वाली बात यह है कि जिसकी मृत्यु होती है वह पूर्ण परमात्मा कैसे हो सकता है अर्थात वह जगन्नाथ कैसे जगन्नाथ तो कोई और ही है जो अशंख क ब्रह्मांड का स्वामी है जिसकी कभी भी मृत्यु नहीं होती। ना वह कभी किसी मां के गर्भ से जन्म लेता आपको बता दें कि वह पूर्ण परमात्मा जगन्नाथ कबीर साहेब हैं जो कि कभी जन्म नहीं लेते और ना ही उनकी मृत्यु होती है वह प्रकट होते हैं इसका प्रमाण हमारे पवित्र वेदों में मिलता है। तथा परमात्मा कबीर साहिब ने अपनी वाणी में स्पष्ट प्रमाण दिया है कि:-
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| Who Is Real Jagannath |
ना मेरा जन्म न गर्भ बसेरा बालक बन दिखलाया।
काशी नगर जल कमल पर डेरा तहां जुलाहे ने पाया।।
यदि भगवान श्री कृष्ण जी जगन्नाथ हैं तो उनकी कृपा से वह मंदिर क्यों नहीं बन पाया। आपको बता दें कि असली जगन्नाथ पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब हैं वही सब के पालन करता है। पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी काशी नगर में लहरतारा नामक तालाब पर प्रकट हुए तथा 120 वर्षों तक सत्य ज्ञान का प्रचार किया व मोक्ष का मार्ग बताया अतः आप सभी लोगों से निवेदन है कि पूर्ण परमात्मा कबीर साहिब जी के ज्ञान को समझे जिसे वर्तमान समय में जगतगुरु संत रामपाल जी महाराज बता रहे हैं तथा सत भक्ति करें व अपना कल्याण कराएं। अधिक जानकारी के लिए अवश्य देखें साधना चैनल शाम 7:30 बजे।
अथवा हमारी वेबसाइट पर देखें:-
Visit:-. Supremgod.org







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