Mahashivratri
महाशिवरात्रि का व्रत कितना लाभदायक है?
भारत एक धार्मिक संप्रदाय वाला देश है यहां पर अनेकों धर्म के लोग निवास करते हैं जिनमें प्रमुख हैं हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध इत्यादि।
सभी धर्म के लोग अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार अनेको त्यौहार मनाते हैं जिनमें हिंदू धर्म इसमें बहुत आगे है। हिंदू धर्म में समय-समय पर अनेकों प्रकार के त्योहार मनाए जाते हैं जैसे होली, दीवाली, रक्षाबंधन, श्री कृष्ण जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि, गणेश चतुर्थी आदि।
आज हम महाशिवरात्रि के विषय पर चर्चा करेंगे आपको बता दें कि महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। तथा इसे विशेष धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार हिंदू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक वर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को मनाया जाता है। यदि हम अंग्रेजी कैलेंडर की बात करें तो यह पर्व लगभग फरवरी के अंत में तथा मार्च के प्रारंभ में आता है।
इस दिन शिवलिंग के रुद्राभिषेक का विशेष महत्व होता है। हिंदू धर्म के लोग इस दिन व्रत उपवास करते हैं तथा शिव जी के शिवलिंग पर दूध जल व बेलपत्र चढ़ाकर शिव जी को प्रसन्न करते हैं। हिंदू धर्म में मान्यता है कि शिवजी की आराधना करने से सभी सुख प्राप्त हो सकते हैं।
महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव के साथ माता (शक्ति) पार्वती का विवाह हुआ था। इसलिए इस दिन को शिव और शक्ति के मिलन का दिन भी कहा जाता है। इस दिन भगवान शंकर के साथ माता पार्वती की भी विशेष रूप से पूजा अर्चना की जाती है।
महाशिवरात्रि के व्रत की बात की जाए तो यह व्रत करना उचित नहीं है। क्योंकि हमारे पवित्र शास्त्रों में व्रत करने के लिए मना किया है। व्रत करने से किसी भी प्रकार का लाभ प्राप्त नहीं होता है। ना ही साधक को किसी भी प्रकार का सुख वह मोक्ष प्राप्त हो सकता है। इसका प्रमाण पहुंचा गीता जी अध्याय 6 के श्लोक 16 में वर्णित है। जिसमें भगवान काल (ब्रह्म) अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है कि:-
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥16/6
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥16/6
अर्थ:- हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
इससे साबित होता है कि व्रत उपवास करने से किसी भी प्रकार का शौक हुआ लाभ प्राप्त नहीं हो सकते तथा शास्त्र विधि को त्याग कर जो मन माना आचरण करते हैं वह गलत है। इसका प्रमाण गीता जी अध्याय 16 के श्लोक 23 व 24 में दिया है कि:-
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ 23/16
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥ 23/16
अर्थ:- जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ 24/16
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ 24/16
अर्थ:- इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है।
ऊपर दिए गए पवित्र गीता जी के श्लोकों से प्रमाणित होता है कि महाशिवरात्रि का व्रत करना व्यर्थ है।
हिंदू धर्म के लोगों का मानना है कि शिवजी अजर, अमर, अविनाशी परमात्मा है उनके ऊपर कोई भी नहीं है आपको बता दें कि शिवजी पूर्ण परमात्मा नहीं है।
इसका प्रमाण श्रीमद् देवी भागवत पुराण
तीसरा स्कंद अध्याय 4 पृष्ठ 10, श्लोक 42:-
तीसरा स्कंद अध्याय 4 पृष्ठ 10, श्लोक 42:-
ब्रह्मा - अहम् इश्वरः फिल ते प्रभावात्सर्वे वयं जनि युता न यदा तू नित्याः, के अन्यसुराः शतमख प्रमुखाः च नित्या नित्या त्वमेव जननी प्रकृतिः पुराणा। (42)
हिन्दी अनुवाद:- हे मात! ब्रह्मा, मैं तथा शिव तुम्हारे ही प्रभाव से जन्मवान हैं, नित्य नही हैं अर्थात् हम अविनाशी नहीं हैं, फिर अन्य इन्द्रादि दूसरे देवता किस प्रकार नित्य हो सकते हैं। तुम ही अविनाशी हो, प्रकृति तथा सनातनी देवी हो। (42)
ऊपर दिए गए इस श्लोक से प्रमाणित होता है कि श्री ब्रह्मा विष्णु व शंकर अजर अविनाशी परमात्मा नहीं है।
विचार करें:- यदि स्वयं त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश अजर अमर नहीं है तो वह अपने साधकों को किस प्रकार जन्म मरण के चक्र से छुटकारा दिला सकते हैं अर्थात कैसे मुक्त करा सकते हैं।
अजर अमर परमात्मा तो कोई अन्य है जिसकी गवाही पवित्र चारों वेद, पवित्र गीता जी, पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब, पवित्र कुरान तथा पवित्र बाइबल देती है। इन सभी धार्मिक पुस्तकों में पूर्ण परमात्मा का नाम कविर्देव अर्थात कबीर परमेश्वर बताया गया है।
तथा समय-समय पर हुए अनेकों संत जिनमें प्रमुख हैं संत दादू दास जी, संत गरीब दास जी, संत धर्मदास जी संत रविदास जी, संत घीसा दास जी, संत रामानंद जी, सन्त गुरुनानक जी आदि इन्होंने भी अपनी वाणियों में प्रमाण दिया है कि पूर्ण परमात्मा का नाम कविर्देव अर्थात कबीर परमेश्वर है।
प्रमाण के लिए अवश्य देखें नीचे दी गई फोटो:-
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| God proof |
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| Kabir is god proof |
पवित्र वेद तथा सभी पवित्र धार्मिक पुस्तकें यही प्रमाणित करते हैं कि पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी हैं तथा वही पूजने योग्य हैं। उनकी भक्ति करने से ही सभी प्रकार के दुखों से तथा इस संसार से मुक्ति पाई जा सकती है। अतः आप सभी से निवेदन है कि शास्त्र विरुद्ध साधना ना करके शास्त्र अनुकूल साधना करें वह अपने जीवन का कल्याण कराए।
वर्तमान समय में शास्त्र अनुकूल भक्ति विधि व ज्ञान संत रामपाल जी महाराज बता रहे हैं। अतः आपसे निवेदन है कि संत रामपाल जी महाराज के ज्ञान को समझ कर सत भक्ति करें तथा अपने अनमोल जीवन को व्यर्थ में नष्ट होने से बचाएं।
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